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द्वंद

इस घर में मैं ही हूँ,
यहाँ मखमली तकियें सिलवटों की राह ताकते हैं,
चार दीवार की खामोशी में,
खिड़कियों से बस कुछ लोग झाँकते है।
वो घर और था,
जहाँ मेरे अपने आते जाते थे,
वो दिन थे जब माँ की गोद मयस्सर थी,
और एक थपकी पर सपने आते थे।

जब नानी रातों को घंटो किस्से सुनाती थी,
हाथ सर पर फेरकर,
परियों के साथ सुलाती थी,
वहांँ नाना रोज़ मिठाई लाते थे,
खामोशी ने नहीं किया था कब्ज़ा वहां,
सुबह से शाम बच्चे खिलखिलाते थे।

वो घर अब बस एक याद है,
शाम की अज़ान अभ भी कानों में गूंजती है,
नानी के हाथ के अचार का लभ पर अभ भी स्वाद है,
वहांँ की कुछ दीवारें टूटी हुई थी,
छत से बूंदे टपकने के बाद भी,
शामें वहांँ के नज़ारो ने लूटी हुई थी।

इस घर में मैं ही हूँ,
यहाँ संगमरमर का फर्श भी चुभता है,
और अलमारियों में खामोशी बन्द है,
वहाँ लोगों से नोकझोक होती थी,
अब बस तनहाइयों से द्वंद है।

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